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सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय

सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय, Subhash Chandra Bose Biography In Hindi, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा राज्य के कटक स्थान पर 23 जनवरी 1897 को हुआ था। इनका परिवार बंगाल का एक सम्पन्न परिवार था। इनके पिता जानकी नाथ बोस बंगाल के एक प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध वकील थे। इनकी माता प्रभावती धार्मिक और पतिव्रता स्त्री थी। ये 14 बहन भाई थे, जिसमें से ये नौंवो स्थान पर थे। सुभाष चन्द्र बोस का बाल्यकाल बड़ी सम्पन्नता में व्यतीत हुआ। इन्होंने कभी भी किसी भी वस्तु का अभाव नहीं देखा।

इनकी आवश्यकता अनुसार प्रत्येक वस्तु इन के पास होती थी। अभाव था तो केवल माता-पिता के वात्सल्य का। इनके पिता अपने पेशे में व्यस्त रहने के कारण परिवार और बच्चों को समय नहीं दे पाते थे और माता इतने बड़े परिवार के पालन पोषण में लगी रहने के कारण इन्हें ध्यान नहीं दे पाती थी जिससे ये बाल्यकाल से ही गम्भीर स्वभाव के हो गये। ये बस अपने बड़े भाई शरत् चन्द्र के करीबी थे और अपनी सभी बातों और निर्णयों पर उनसे सलाह लेते थे।

Subhash Chandra Bose Biography

सुभाष चन्द्र बोस के पिता जानकी नाथ बोस वास्तविक रुप से बंगाल के परगना जिले के एक छोटे से गाँव के रहने वाले थे। ये वकालत करने के लिये कटक आ गये क्योंकि इनके गाँव में वकालत में सफल होने के कम अवसर थे। लेकिन कटक में इनके भाग्य ने इनका साथ दिया और सुभाष के जन्म से पहले ही ये अपने आपको वकालत में स्थापित कर चुके थे। ये अब तक एक प्रसिद्ध सरकारी वकील बन गये थे तथा नगर पालिका के प्रथम भारतीय गैर सरकारी अध्यक्ष भी चुने गये।

देशभक्ति सुभाष को अपने पिता से विरासत में मिली थी। इनके पिता सरकारी अधिकारी होते हुये भी कांग्रेस के अधिवोशनों में शामिल होने के लिये जाते रहते थे। ये लोकसेवा के कार्यों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे। ये खादी, स्वदेशी और राष्ट्रीय शैक्षिक संस्थाओं के पक्षधर थे। सुभाष चन्द्र बोस की माता प्रभावती उत्तरी कलकत्ता के परंपरावादी दत्त परिवार की बेटी थी। ये बहुत ही दृढ़ इच्छाशक्ति की स्वामिनी, समझदार और व्यवहारकुशल स्त्री थी साथ ही इतने बड़े परिवार का भरण पोषण बहुत ही कुशलता से करती थी।

सुभाष चन्द्र बोस की प्रारम्भिक शिक्षा कटक के ही स्थानीय मिशनरी स्कूल में हुई। इन्हें 1902 में प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल में प्रवोश दिलाया गया। ये स्कूल अंग्रेजी तौर-तरीके पर चलता था जिससे इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की अंग्रेजी अन्य भारतीय स्कूलों के छात्रों के मुकाबले अच्छी थी। ऐसे स्कूल में पढ़ने के और भी फायदे थे जैसे अनुशासन, उचित व्यवहार और रख-रखाव आदि। इनमें भी अनुशासन और नियमबद्धता बचपन में ही स्थायी रुप से विकसित हो गयी।

इस स्कूल में पढ़ते हुये इन्होंने महसूस किया कि वो और उनके साथी ऐसी अलग-अलग दुनिया में रहते हैं जिनका कभी मेल नहीं हो सकता। सुभाष शुरु से ही पढ़ाई में अच्छे नंबरों से प्रथम स्थान पर आते थे लेकिन वो खेल कूद में बिल्कुल भी अच्छे नहीं थे। जब भी किसी प्रतियोगिता में भाग लेते तो उन्हें हमेशा शिकस्त ही मिलती।

1909 में इनकी मिशनरी स्कूल से प्राइमरी की शिक्षा पूरी होने के बाद इन्हें रेवेंशॉव कॉलेजिएट में प्रवोश दिलाया गया। इस स्कूल में प्रवोश लेने के बाद बोस में व्यापक मानसिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आये। ये विद्यालय पूरी तरह से भारतीयता के माहौल से परिपूर्ण था। सुभाष पहले से ही प्रतिभाशाली छात्र थे, बस बांग्ला को छोड़कर सभी विषयों में अव्वल आते थे। इन्होंने बांग्ला में भी कड़ी मेहनत की और पहली वार्षिक परीक्षा में ही अच्छे अंक प्राप्त किये। बांग्ला के साथ-साथ इन्होंने संस्कृत का भी अध्ययन करना शुरु कर दिया।

रेवेंशॉव स्कूल के प्रधानाचार्य (हेडमास्टर) बेनीमाधव दास का सुभाष के युवा मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। माधव दास ने इन्हें नैतिक मूल्यों पर चलने की शिक्षा दी साथ ही ये भी सीख दी कि असली सत्य प्रकृति में निहित है अतः इसमें स्वंय को पूरी तरह से समर्पित कर दो। जिसका परिणाम ये हुआ कि ये नदी के किनारों और टीलों व प्राकृतिक सौंन्दर्य से पूर्ण एकांत स्थानों को खोजकर ध्यान साधना में घंटों लीन रहने लगे।

सुभाष चन्द्र के सभा और योगाचार्य के कार्यों में लगे रहने के कारण इनके परिवार वाले व्यवहार से चिन्तित होने लगे क्योंकि ये अधिक से अधिक समय अकेले बिताते थे। परिवार वालों को इनके भविष्य के बारे में चिन्ता होने लगी कि इतना होनहार और मेधावी होने के बाद भी ये पढ़ाई में पिछड़ न जाये। परिवार की आशाओं के विपरीत 1912-13 में इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया जिससे इनके माता-पिता बहुत खुश हुये।

मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद इनके परिवार जनों ने इन्हें आगे की पढ़ाई के लिये कलकत्ता भेज दिया। 1913 में इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज प्रेजिडेंसी में एडमिशन (प्रवोश) लिया। सुभाष चन्द्र बोस ने यहाँ आकर बिना किसी देर के सबसे पहले आदर्श दल से सम्पर्क बनाया जिसका दूत इन से मिलने कटक आया था। उस समय इनके कॉलेज के छात्र अलग-अलग गुटों (दलों) में विभक्त थे। जिसमें से एक गुट आधुनिक ब्रिटिश राज-व्यवस्था की चापलूसी करता था, दूसरा सीधे-सादे पढ़ाकू छात्रों का था, एक दल सुभाष चन्द्र बोस का था - जो स्वंय को रामकृष्ण - विवोकानन्द का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानते थे और एक अन्य गुट था - क्रान्तिकारियों का गुट।

जब सुभाष कटक से कलकत्ता आये थे तो इनका स्वभाव आध्यात्मिक था। ये समाज सेवा करना चाहते थे और समाज सेवा योग साधना का ही अभिन्न अंग है। ये अपना ज्ञान बढ़ाने के लिये ऐतिहासिक और धार्मिक स्थानों पर घूमने जाते थे। अपने कॉलेज के समय में बोस अरविन्द घोष के लेखन, दर्शन और उनकी यौगिक समन्वय की धारणा से प्रेरित थे। इस समय तक इनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं था।

बी. ए. आनर्स (दर्शन-शास्त्र) करते समय सुभाष चन्द्र बोस के जीवन में एक घटना घटी। इस घटना ने इनकी विचारधारा को एक नया मोड़ दिया। ये बी. ए. आनर्स (दर्शनशास्त्र) के प्रथम वर्ष के छात्र थे। लाइब्रेरी के स्व-अध्ययन कक्ष में पढ़ते हुये इन्हें बाहर से झगड़े की कुछ अस्पष्ट आवाजें सुनायी दे रही थी। बाहर जाकर देखने पर ज्ञात हुआ कि अंग्रेज प्रोफेसर ई. एफ. ओटेन ने इन्हीं के क्लास के कुछ छात्रों को पीटाई कर रहे थे। मामले की जाँच करने पर पता चला कि प्रोफेसर ओटेन की क्लास से लगे बरामदे (कॉरिड़ोर) में बी. ए. प्रथम वर्ष के कुछ छात्र शोर कर रहे थे, लेक्चर में बाधा उपस्थित करने के जुर्म में प्रोफेसर ने पहली लाइन में लगे छात्रों को निकाल कर पीट दिया था।

सुभाष चन्द्र अपनी क्लास के प्रतिनिधि थे। इन्होंने छात्रों के अपमान करने की इस घटना की सूचना अपने प्रधानाचार्य को दी। अगले दिन, इस घटना के विरोध में छात्रों द्वारा कॉलेज में सामूहिक हड़ताल का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस ने किया। ये कॉलेज के इतिहास में पहली बार था जब छात्रों ने इस प्रकार की हड़ताल की थी। हर तरफ इस घटना की चर्चा हो रही थी। मामला अधिक न बढ़ जाये इसलिये अन्य शिक्षकों और प्रबंध समिति की मध्यस्था से उस समय तो मामला शान्त हो गया, लेकिन एक महीने बाद उसी प्रोफेसर ने दुबारा इनके एक सहपाठी को पीट दिया जिस पर कॉलेजों के कुछ छात्रों ने कानून को अपने हाथों में लिया जिसका परिणाम ये हुआ कि छात्रों ने प्रोफेसर को बहुत बुरी तरह पीटा। समाचार पत्रों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक सभी में इस घटना ने हलचल मचा दी।

छात्रों पर ये गलत आरोप लगाया गया कि प्रो. ओटेन पर हमला करते समय उन्हें सीढ़ियों से धक्का देकर नीचे गिराया गया था। सुभाष इस घटना के चश्मदीद गवाह थे। वो जानते थे कि ये आरोप सिर्फ एक कोरा झूठ है, एक प्रत्यक्षदर्शी (चश्मदीद गवाह) होने के नाते बिना किसी ड़र के विरोधाभास के ये बात दावो के साथ कह सकते थे। छात्रों की निष्पक्षता के लिये ये बात साफ होनी आवश्यक थी। लेकिन ये घटना सरकार और कॉलेज की अध्यापकों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गयी। छात्रों की ओर से किसी भी प्रकार की सफाई की अवहेलना करते हुये कॉलेज के प्रधानाचार्य ने प्रबंध समिति के सम्मानित व्यक्तियों से सलाह करके कॉलेज के शरारती बच्चों को स्कूल से निकाल दिया। इन निकाले गये छात्रों की हिट लिस्ट में सुभाष चन्द्र बोस का नाम भी शामिल था। उन्होंने सुभाष को बुलाकर कहा–

'बोस! तुम कॉलेज में सबसे ज्यादा परेशानी उत्पन्न करने वाले छात्र हो। मैं तुम्हें निलम्बित करता हूँ।'

सुभाष - 'धन्यवाद'

इतना कहकर वो घर आ गये। इस निर्णय के बाद प्रबंध समिति ने प्रधानाचार्य के इस निर्णय पर मोहर लगा दी। इन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। सुभाष चन्द्र ने विश्वविद्यालय से किसी अन्य कॉलेज में पढ़ने की अनुमति माँगी जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इस तरह इन्हें पूरे विश्वविद्यालय से निष्काषित कर दिया गया। कुछ राजनीतिज्ञों ने इसे प्रधानाचार्य के अधिकार के बाहर का निर्णय कहा जिसे जाँच कमेटी ने अपने हाथ में ले लिया।

जाँच कमेटी के सामने इन्होंने छात्रों का प्रतिनिधित्व किया और कहा कि वो प्रोफेसर पर हमले को सही नहीं मानते पर उस समय छात्र इतने भड़के हुये थे कि उन्हें नियंत्रित करना बहुत मुश्किल था। इसके बाद इन्होंने कॉलेज में अंग्रेजों द्वारा किये जाने वाले बुरे व्यवहार का वर्णन किया। जब कमेटी की रिपोर्ट आयी तो छात्रों के पक्ष में कोई भी शब्द नहीं था, सिर्फ सुभाष चन्द्र के बारे में ही जिक्र था।

इस तरह उनके आगे की पढ़ाई करने के रास्ते बन्द हो गये। लेकिन कठिनाई के इस समय में उनके परिवार वालों ने उनका साथ दिया। इनके संबंधी जानते थे कि वो जो कर रहे हैं, सही कर रहे है। सुभाष को भी अपने किये पर कोई पछतावा नहीं था। आगे की पढ़ाई की कोई सम्भावना न रहने पर ये पूरी तरह से समाज के कार्यों में लग गये। इस घटना ने इनके जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। इनकी सोच और विचारधारा में काफी परिवर्तन हो गये। इस समय में इन्होंने अपने मनोभावों को जानने के लिये आत्म विश्लेषण किया।

लगभग एक वर्ष की उथल-पुथल के बाद विश्व विद्यालय में प्रवोश के लिये ये पुनः कलकत्ता आ गये। यहाँ अधिकारियों के निर्णय की प्रतीक्षा करते समय 49 वीं बंगाल रेजीमेंट में भर्ती होने की कोशिश की, लेकिन खराब आँखों के कारण भर्ती में असफल रहे। बाद में इन्हें सूचना दी गयी कि ये किसी अन्य विद्यालय से प्रवोश लेकर पढ़ सकते हैं। इस सूचना के बाद ये स्कॉटिश चर्च कॉलेज के प्रधानाचार्य (डॉ. अर्कहार्ट) से मिले और उन्हें बताया कि वो दर्शन शास्त्र में आनर्स करना चाहते है। अर्कहार्ट बहुत ही व्यवहार कुशल और दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखने वाले व्यक्ति थे। वो सुभाष के व्यवहार से प्रभावित हुये और उन्हें प्रवोश की अनुमति दे दी। डॉ. अर्कहार्ट दर्शन शास्त्र के अत्यंत योग्य अध्यापक भी थे।

सुभाष अपने जीवन में कुछ नये अनुभव प्राप्त करना चाहते थे और कुछ नया और चुनौती पूर्ण करना चाहते थे। इस समय ब्रिटिश भारत सरकार ने इंडिया डिफेंस की फोर्स की एक विश्वविद्यालय स्तर पर प्रादेशिक सेना (टेरिटोरियल आर्मी) के गठन की स्वीकृति दे दी। इसमें भर्ती होने के मापदण्ड सेना में भर्ती करने जितने कड़े नहीं थे अतः इन्हें भर्ती कर लिया गया। इन्होंने 4 महीने के शिविर के जीवन और 3 सप्ताह का मसकट (छोटी बन्दूक) के अभ्यास के बाद बंगाली छात्रों के लिये बनी अवधारणा कि “बंगाली सेना में अच्छा प्रदर्शन नहीं करते” को गलत सिद्ध कर दिया।

इनके पिता जानकी नाथ कलकत्ता आये हुये थे और इनके बड़े भाई शरत् चन्द्र के पास रुके हुये थे। एक शाम इनके पिता ने इन्हें बुलाया और कहा कि क्या वो आई.सी.एस. की परीक्षा देना चाहेंगे। अपने पिता के इस फैसले से इन्हें बहुत झटका लगा। इनकी सारी योजनाओं पर पानी फिर गया। इन्हें अपना निर्णय बताने के लिये 24 घंटे का समय दिया गया। इन्होंने कभी अपने सपने में भी अंग्रेज सरकार के अधीन कार्य करने के लिये नहीं सोचा था, लेकिन परिस्थतियों के सामने मजबूर होकर इन्होंने ये निर्णय ले लिया। इनके इस निर्णय के बाद एक सप्ताह के अन्दर ही पासपोर्ट बनवाकर इंग्लैण्ड जाने वाले जहाज पर व्यवस्था करा कर इनको भेज दिया गया। वो भारत से इंग्लैण्ड जाने के लिये 15 सितम्बर को रवाना हुये।

इंग्लैण्ड जाकर आई.सी.एस. की परीक्षा देने के अपने पिता के फैसले को मानने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था अतः भाग्य के भरोसे ये इंग्लैण्ड चले गये। भारत से इंग्लैण्ड जाते समय इनके पास आई.सी.एस. की परीक्षा के लिये केवल 8 महीने थे और उम्र के अनुसार ये इनका पहला और आखिरी मौका भी था। इनका जहाज निर्धारित समय से एक हफ्ते बाद इंग्लैण्ड पहुँचा। ये 25 अक्टूबर को इंग्लैण्ड पहुँचे थे।

इंग्लैण्ड पहुँचने से पहले ही इनका अध्ययन सत्र शुरु हो गया जिससे किसी अच्छे कॉलेज में प्रवेश का मौका मिलना भी कठिन था। अतः अपनी इस समस्या को लेकर सुभाष चन्द्र बोस इंडिया हाऊस के भारतीय विद्यार्थियों के सलाहकार से मिलने गये। इस मुलाकात से इन्हें भी निराशा ही हाथ लगी। चारों ओर से किसी भी प्रकार के सहयोग की उम्मीद न होने पर ये सीधे कैंम्ब्रिज यूनिवर्सिटी गये। किट्स विलियम हॉल के सेंसर (परीक्षा में बैठने वाले छात्रों की योग्यता का आंकलन करने वाला बोर्ड) ने इनकी समस्याओं को देखते हुये प्रवेश कर लिया और 1921 जून में होने वाली परीक्षा के लिये छूट भी प्रदान कर दी।

सिविल परीक्षा निकट होने के कारण इन्होंने अपना सारा समय तैयारी में लगा दिया। मानसिक और नैतिक विज्ञान (आनर्स) की तैयारी के लिये लेक्चर लेने के साथ ही अपने पाठ्यक्रम से संबंधित इंडियन मजालिस और यूनियन सोसायटी के कार्यक्रमों में भाग भी लेते थे। अपने लेक्चर के घंटों के अतिरिक्त भी इन्हें पढ़ाई करनी पड़ती थी, जितनी मेहनत से ये पढ़ाई कर सकते थे उतनी मेहनत से पढ़ाई की। पुरानी सिविल सर्विस के रेंग्युलेसन के अनुसार इन्हें लगभग 8-9 अलग-अलग विषयों को पढ़ना होता था।

इंड़ियन सिविल सर्विस की परीक्षा जुलाई 1920 में शुरु हुई और लगभग एक महीने तक चली। सुभाष चन्द्र बोस को परीक्षा में पास होने की कोई उम्मीद नहीं थी अतः अपने घर के लिये चिट्ठी लिखी कि इन्हें अपने पास होने की कोई उम्मीद नहीं है और ये अगले साल की ट्राईपास की तैयारी में लगे हुये हैं। सितम्बर के मध्य में जब रिजल्ट आया तो इनके मित्र ने इन्हें तार द्वारा बधाई दी। अगले दिन इन्होंने अखबार में आई.सी.एस. के सफल उम्मीदवारों में अपना नाम देखा। इन्होंने योग्यता सूची में चौथा स्थान प्राप्त किया था।

आई.सी.एस. की परीक्षा का परिणाम देखने के बाद सुभाष चन्द्र बोस को पास होने की खुशी हुई क्योंकि ये अब अपने देश भारत वापस लौट सकते थे। लेकिन इस परीक्षा के पास होते ही अब एक विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो गयी। ये स्वामी विवोकानंद और रामकृष्ण के आदर्शों को मानने वाले थे ऐसी स्थिति में इस नौकरी को करना अपने आदर्शों के खिलाफ समझते थे। इस विरोधाभास की स्थिति में बोस ने अपने बड़े भाई शरत् चन्द्र को पत्र लिखकर अपने नौकरी न करने के फैसले के बारे में बताया और उन्हें खत लिखने के 3 हफ्ते के बाद 22 अप्रैल 1921 को बोस ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फार इंडिया ई.एस.मांटेग्यूको पत्र लिखकर परिवीक्षाधीन अफसरों (प्रोबेशनर्स) की सूची से अपना नाम वापस लेने की घोषणा कर दी।

आई.सी.एस. की नौकरी छोड़कर बोस ने इंग्लैण्ड के भारतीय समाज में हलचल मचा दी। चारों तरफ इनके इस निर्णय की चर्चा होने लगी। सुभाष इस वाहवाही और सनसनी दोंनो से बचना चाहते थे। ये कार्य तो बोस ने अपने आत्म सुधार के एक प्रयास के रुप में किया था। सुभाष चन्द्र मनोविज्ञान एवं नैतिक विज्ञान की ट्राइपास परीक्षा देने के तुरंत बाद जून 1921 में भारत वापस आ गये और राष्ट्रीय आन्दोलनमें भाग लेने लगे। जिस जहाज से बोस भारत आ रहे थे उसी जहाज में रविन्द्र नाथ टैगोर भी थे। टैगोर जी ने इन्हें भारत में गाँधी से मुलाकात करने की सलाह दी थी। 16 जुलाई 1921 को बम्बई पहुँचने पर इन्होंने गाँधी जी से मुलाकात की। इस मुलाकात में बोस ने गाँधी के आन्दोलन की रणनीति और सक्रिय कार्यक्रम की स्पष्ट जानकारी जानना चाहते थे क्योंकि वो (गाँधी) आन्दोलन के सर्वोच्च नेता थे।

सुभाष चन्द्र बोस गाँधी से आन्दोलनों के उन निर्धारित क्रमबद्ध चरणों को जानना चाहते थे जिनका प्रयोग करके अंग्रेजों से सत्ता प्राप्त करने में सफल हो सके। इन्होंने आन्दोलन के प्रत्येक विषय से संबंधित सवालों की छड़ी लगा दी। गाँधी ने इनके सभी सवालों का जबाब धैर्य पूर्वक दिया लेकिन कर न देने की मुहिम से संबंधित सभी सवालों के जबाबों के अतिरिक्त और अन्य किसी भी आन्दोलन के स्पष्ट जबावों से वो बोस को सन्तुष्ट न कर सके।

महात्मा गाँधी से मिलने के बाद ये तुरन्त सी.आर.दास (देशबन्धु) से मिलने के लिये कलकत्ता चले गये। पर इनकी मुलाकात देशबन्धु से नहीं हो पायी क्योंकि वो दौरे पर गये हुये थे। कुछ समय इंतजार करने के बाद इनकी भेंट दास से हुई जो बहुत हद तक निर्णायक भी रही। इन्होंने देशबन्धु जी से मुलाकात करके महसूस किया कि दास जानते हैं कि वो क्या करने जा रहें हैं और इसे प्राप्त करने के लिये कौन कौन सी रणनीतियों को अपनाने से सफलता मिलेगी। दास अपने लक्ष्य की उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये अपना सब कुछ त्याग करने के लिये तैयार थे, जिसके कारण वो दूसरों को भी सर्वस्व त्याग के लिये मांग कर सकते थे।

सुभाष चन्द्र बोस देशबन्धु चितरंजन दास से मिलकर बहुत प्रभावित हुये। उनसे मिलकर बोस को ऐसा लगा कि अपने जीवन के उद्देश्य प्राप्ति के रास्ते के साथ-साथ गुरु भी प्राप्त कर लिया, जिसका ये जीवन भर अनुसरण कर सकेंगे। 1921 में देश के कोने कोने में तिहरे बहिष्कार की लहर थी। वकील न्यायालाय की प्रक्रिया में भाग न लेकर न्यायिक व्यवस्था का बहिष्कार कर रहे थे, छात्रों ने विद्यालयों में जाना छोड़ दिया, कांग्रेसी नेताओं ने विधान मंडल की प्रक्रिया में भाग लेना बन्द कर दिया। लोग इसमें बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे थे।

नवम्बर 1921 में ब्रिटिश राजसिंहासन के वारिस प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत आने की घोषणा की गयी। जब ब्रिटिश सरकार ने प्रिंस के आने की घोषणा की तो सारे देश में जगह-जगह कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा हड़तालों और बन्द का आयोजन किया गया, जिससे सरकार ने कांग्रेस सरकार को ही गैरकानूनी घोषित कर दिया। इस बात ने आग में घी डालने का कार्य किया। प्रदेश की कांग्रेस समिति ने सारे अधिकार अपने अध्यक्ष सी.आर.दास को सौंप दिये और इन्होंने बोस को आन्दोलन का मुखिया बना दिया। प्रान्त में आन्दोलन को संचालित करने में बोस ने अभूतपूर्व नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया।

आन्दोलन दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। उस समय तो ये आन्दोलन और भी तेज हो गया जब सी.आर.दास की पत्नी वासन्ती देवी को उनकी सहयोगियों के साथ गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। इससे खुद की गिरफ्तारी देने वाले युवाओं और युवतियों की संख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई। 1921 के दूसरे हफ्ते में देशबन्धु और सुभाष चन्द्र के साथ अन्य नेताओं को भी कैद कर लिया गया। उन्हें बाद में छह महीने की सजा हुई। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेते हुये ये सुभाष चन्द्र बोस की पहली गिरफ्तारी थी।

स्वदेश लौटने के बाद सुभाष भारत के दो महान राजनीति के नायक गाँधी व देशबन्धु से मिले। गाँधी से मिलने पर इन्हें निराशा मिली। लेकिन जब ये देशबन्धु सी.आर.दास से मिले तो उनके विचारों और कार्यों से इतने प्रभावित हुये कि उन्हें अपना गुरु बना लिया। एक सच्चे शिष्य की भाँति वो देशबन्धु के पद चिन्हों पर चलने लगे। शीघ्र ही इन्होंने अपने नेतृत्व के द्वारा अपनी योग्यता का लोहा मनावा लिया।

1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गाँधी ने असहयोग आन्दोलन को वापस ले लिया। उस समय सुभाष चन्द्र बोस और देशबन्धु दोनों जेल में थे। उन दोनों को ही इस निर्णय से बहुत दुख हुआ। लोगों में उमड़ती हुई आशा, निराशा में बदल गयी। दिसम्बर 1922 में कांग्रेस का गया (बिहार) अधिवेशन आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता सी.आर.दास ने की। इस अधिवोशन में कांग्रेस के सभी सदस्यों मे कुछ मुद्दों पर गतिरोध उत्पन्न हो गया। देशबन्धु के समर्थक परिवर्तन चाहते थे और गाँधी के समर्थक किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं चाहते थे। देशबन्धु का प्रस्ताव गिर गया और उनकी अध्यक्ष के रुप में स्थिति कमजोर हो गयी। दूसरी तरफ मोती लाल नेहरु ने कांग्रेस मुक्त स्वराज पार्टी के गठन की घोषणा कर दी। इस तरह देशबन्धु कांग्रेस से अलग होकर स्वराज्य पार्टी के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। सुभाष चन्द्र इन सभी गतिविधियों में अपने गुरु के साथ थे।

भारत की आजादी के लिये संघर्ष करते हुये अनेक क्रान्तिकारी भारतीय शहीद हुये। ऐसे ही महान क्रान्तिकारी, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे सुभाष चन्द्र बोस। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपने कार्यों से अंग्रेजी सरकार के छक्के छुड़ा दिये। इन्होंने अपने देश को आजाद कराने के लिये की गयी क्रान्तिकारी गतिविधियों से ब्रिटिश भारत सरकार को इतना ज्यादा आंतकित कर दिया कि वो बस इन्हें भारत से दूर रखने के बहाने खोजती रहती, फिर भी इन्होंने देश की आजादी के लिये देश के बाहर से ही संघर्ष जारी रखा और वो भारतीय इतिहास में पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हुये जिसने ब्रिटिश भारत सरकार के खिलाफ देश से बाहर रहते हुये सेना संगठित की और सरकार को सीधे युद्ध की चुनौती दी और युद्ध किया। इनके महान कार्यों के कारण लोग इन्हें 'नेताजी' कहते थे।

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